2/21/2016

परीक्षा की घड़ी

नारायण का रूप ये नर है,
मन की जोत इसमें भी प्रखर है,
सकल सम्पदा का स्वामी यह,
जगती का अनुपम धरुहर है ।।

2/19/2016

पटना में उपचार

आदमी तो वही रहता है पर उसकी नींद रूठ जाती है ।
तमन्ना की असलियत नहीं बदलती है पर उसके मायने बदल जाते हैं ।
आदमी अपनी और उसकी तमन्ना के रूह को क्यों नहीं पहचानते जो उसके लिबास बदल जाते हैं ।
अब नींद भला सुलाने आए तो किसे चूंकि उसको बुलानेवाले ही बदल जाते हैं ।।



चंद्रकिशोर प्रसाद

4/15/2015

शील अर्थात सदाचार का महत्त्व

अंतः जटा बहिः जटा जटायाम जटितापजा ।
तं तं पिच्छामि गोतमोति कं विजटयेजटन्ति ।
सीलं पटिट्ठाय नरो सपन्नो चित्तं तन्हा न भावये ।
आतापी निपको भिक्खु तं विजटयेजटन्ति ।।

(संयुत्त निकाय, बाम्हन वग्ग, जटिल सुत्त)

जब गौतमबुद्ध से जटिल ब्राह्मण ने पूछा कि अंदर-बाहर सभी ओर से जटिल इस संसार में कौन ऐसा पुरुष है जो इस जटिलता को काटकर बाहर आ सकता है, तो उस जटिल ब्राह्मण को जवाब देते हुए गौतम बुद्ध ने कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन के व्यवहार में सदाचारी है तथा जो सभी प्रकार की इच्छाओं को त्याग चुका है अर्थात अपने आपको उस विराट प्रकृति पर समर्पित कर चुका है, जो हर अवस्था में स्थिर रहनेवाला है तथा जो सांसारिक व्यवहारों में निपुण हो चुका है; ऐसा व्यक्ति बड़ी आसानी से इस जटिलता को काटकर बाहर आ सकता है ।

इस सदाचार के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए संत कबीरदास भी कहते हैं-

"शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ।।"

अतः हम केवल ख़ास-ख़ास मौकों पर ही नहीं बल्कि जीवन के सामान्य और दैनिक क्रियाकलाप में भी सदाचार का पालन करें तभी हमारा जीवन जटिलता से सहजता की ओर अग्रसर हो सकता है ।

धन्यवाद.....

4/09/2015

मन को बांधना क्यों

मन का मनका माला में गुंथकर,
मालिन चतुर बाजार चली ।
ले लो प्यारे ग्राहक बाबू,
आई आज अनारकली ।।

सुन मालिन तू चतुर सयानी,
ठगने आज संसार चली ।
महामोहमय मन को गुंथकर,
माला तूने रची भली ।

एक होय तो हृदय लगाऊँ,
दो को बगल पसार करूँ ।
तीन-चार को सह लूँ केहि विधि,
पर हजार क्या आचार करूँ ?

सुन बाबू तू मेरी बतिया,
एक माली की है यह बगिया ।
फूल हजार खिले हैं लेकिन,
एक ध्येय पर खिली है बगिया ।

सुंदरता से संसार भरा है,
एक न दूजा हुआ खड़ा है ।
अतुल जगत यह अतुल जीव से,
अतुलित अनुपम घाट भरा है ।

हर मनके की अलग कहानी,
बात नई या याद पुरानी ।
मनके जैसा मन कर अपना,
सबके मन की एक ही नानी ।।

1/22/2015

दीप टॉक्स पर मेरे उद्गार

दीप दीवाना मनहि सयाना,
आया अलख जगाने को।
मन का भेद खोलकर सबको,
आनंदित सफल बनाने को ।।

जग में जीवन चमन बनाना,
खुशियों का खुल जाए खजाना,
एक यही उद्देश्य है इनका,
प्रेम-सुधा बरसाने को ।।

मन का भेद खोलकर सबको,
आनंदित सफल बनाने को ।।

जीवन यह संकीर्ण नहीं है,
कठिनाई विस्तीर्ण नहीं है,
लाजवाब क्या राज बताया,
आगे हमें बढ़ाने को ।।

मन का भेद खोलकर सबको,
आनंदित सफल बनाने को ।।

हाल जगत की बात करो क्या,
पार जगत की खबर रखे,
समय, जगह, एहसास कराकर,
मानवता का अर्थ बताने को ।।

मन का भेद खोलकर सबको,
आनंदित सफल बनाने को ।।

भेद न कुछ इनसे छुप पाए,
एकबार जो इन तक आए,
कच्चा-चिट्ठा पल में खोले,
असली औकात बताने को ।।

मन का भेद खोलकर सबको,
आनंदित सफल बनाने को ।।

दूर रहो मत इनसे भाई,
बस इनके नजदीक भलाई,
चंद्र के चिथड़े उड़ा चुके हैं,
अपनापन दर्शाने को ।।

मन का भेद खोलकर सबको,
आनंदित सफल बनाने को ।।

1/16/2015

फिर लोग क्यों बदल जाते हैं?

ऋतुओं के आने से, ऋतुओं के जाने से,
जब पेड़ और पौधे नहीं बदलते,
फिर लोग क्यों बदल जाते हैं?

पत्तों पतंगों को,
सतरंगी कपड़ों को,
कामिनी की जुल्फों को,
लहरानेवाली हवा नहीं बदलती,
फिर लोग क्यों बदल जाते हैं?

पर्वत की शान नहीं बदलती,
सागर की मौजें नहीं बदलती,
लोगों की जान नहीं बदलती,
फिर लोग क्यों बदल जाते हैं?

चंद्र की चांदनी वही है,
कानन और केहरि वही है,
फिर सूरज के किरण क्यों बदल जाते हैं,
फिर लोग क्यों बदल जाते हैं?

1/14/2015

पयः

पद्म पराग पंकज पर प्लावित,
लोभित तव लोचन लालायित,
भार भई भारी भर्ता अब,
दुहु कर देकर दलहु मसायित ।।

चंद्रकिशोर प्रसाद

11/15/2014

कविता की रचना

कविता का उद्वेग सरल,
जब भाव-प्रवण दिल होय प्रबल।
मुखरित अनुभव होय प्रकट तब,
अक्षर में ढल जाय सरल।।

10/29/2014

सरलता से सिद्धि

मन सरल जब तन सरल में,
तब प्रबल नर तेरा जीवन।
सरल पथ पर सुगम गति जब,
तब हो यात्रा सुफल सुन मन।।

मन सरल कर याद भुलाकर,
ध्यान से तू कर सरल तन।
छोड़कर प्रत्याशा सकल तू,
मध्यमार्ग तू ग्रहण कर मन।।

8/29/2014

गणराया

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8/12/2014

आज की बात

दौरा दौड़-दौड़कर दौरा नहीं देती।
वह तो एक शै है जो मचल जाया करती है।।

जो खुद खुदा है उसके लिए अलग से खुदा क्या लाऊँ।
यह सोचते ही हम सिमटकर रह गए।।

आपकी डांट को पाबंद की कूवत हमें कहाँ।
आप ही अपना चमन बसा लो या बाहर कर डालो।।

क्या-क्या मुरादें पालता है नामुराद-ए-दिल मेरा।
अफ़सोस कि नादान दिल अपने असबाब से ही बेखबर।।

8/09/2014

रक्षा-बंधन के अवसर पर

ऐ बहना तेरे भाई की,
कितनी करतूत निराली है।
होश नहीं है रिश्तों की,
कैसी वहशीपन छाई है।।

आड़ सदा ले रिश्तों की,
हरबार कलंक उठाई है।
गली-मोहल्ले की मिठास को,
उसने कितनी कडवा की है।।

कहाँ हुमायूं-कर्णावती की,
लोग मिसालें देते थे
आज सगी बहनों की अस्मत,
भाई सगा दागित की है।।

ठहरो, सुधरो, हुल्लड़बाजों,
ये कसी नादानी है।
माँ-बहनों से ही जगती यह,
सुन्दर-सजल निशानी है।।

8/08/2014

मन मस्त हुआ तब कौन बोले!

मनुष्य जब पूर्णतया अपने भीतर स्थित हो जाता है तो वह कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं रह जाता। धीरे-धीरे वह दुनिया के लिए अजनबी बन जाता है। शुरू-शुरू में तो यह बात उसे खुद भी अखरती है, पर समय के साथ वह इसका अभ्यस्त हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह कि चाहत खत्म हो जाती है। बस वह वह हो जाता है।

7/06/2014

मन है तो जीवन है


मन है तो जीवन है

जीवन-धन अनमोल है,
जीवन की सुधि लेय,
केवल मन का मोल है,
मन साँचा करि लेय.

मन से मानव बना महान,
मन से उपजा सकल जहान,
मन का खेल सकल विज्ञान,
मन की महिमा को करे बखान.

मन से जीवन मन में जीवन,
मन का रस अमृत नित पीवन,
जुगता मन को जिसने निज जीवन,
जयति-जयति उस नर का जीवन.
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6/28/2014

तन्हाई की शहनाई

मैंने भी खयालातों में बसाया था तुझे
मैंने भी अहसासों से सहलाया था तुझे    
गर तूने महसूस न किया तो मेरी क्या खता
अपने जज्बातों के झूले में झुलाया था तुझे।

क्या होता गर तू न होता
कशिश-ए-प्यार का आमद नहीँ होता
क्या होता इन आरजू और तमन्नाओं का        
गर तेरे आमद से ये घर रोशन नहीं होता।

3/09/2014

चुनाव के अवसर पर

सभी वोटरों से निवेदन 

सबदल हालत एक समान 
              बीजेपी में घमासान 
वोटर हो जा सावधान 
              आदमी देख करो मतदान 
 
             प्रजातंत्र का होगा सम्मान.

3/07/2014

विश्व महिला दिवस पर मेरा स्नेह-सुमन

म-   महिला, माता, ममता, मैत्री,
       मधुर, मृदुल, मतिगत्यभिनेत्री॥

हि-    हिम्मत, हसरत, हास्यकारिणी,
         हृदयेशा, हर हिय, हरिभामिनी॥

ला-   लाजवती, ललिता, लावण्या,
        लक्ष्मी, लाड़लि, लतिकारण्या॥

सविनय-
चन्द्रकिशोर

3/06/2014

My photo

Need of self-restraint

The AAP members must learn one more thing i.e. self-restraint. Please remember, no victory can be achieved if you lack it in you. Be best of luck.

3/05/2014

Election

Jung ka bigul fuk gaya. Utho, taiyaar ho jaao. Ek-dedh mahine baad fir paach saal ke lie sonaa padega. Sambhal jaao, kaheen bekhayaalee me fir thag ko hi apnaa paharedaar na banaa baitho.

Dhanyavaad.